Thursday, July 11, 2013

बदल रहा हूँ मैं

सोचा था कभी बदलेंगे ज़माने को एक दिन … !!
ज़माने के संग खुद को अब बदल रहा हूँ मैं …  !!
समझाता हूँ दिल को कि ‘दुनिया है बड़ी ज़ालिम !! 
सबक जिंदगी का ज़माने से अब पढ़ रहा हूँ मैं…. !!
खुद से ही रोज़-रोज़ अब लड़ रहा हूँ मैं … !!

© आशुतोष त्रिपाठी

Tuesday, July 9, 2013

यूँ नहीं की ….

 यूँ नहीं की तुम्हारे ना होने में तुम्हारा ऐहसास नहीं  है  !!
दूर चमकता चाँद … तुम्हारे मुखड़े का प्रतिबिंब  है !!
छत की बारी से लटकती बारिश की बूंदे जैसे तुम्हारे कानों की बालियाँ हैं !!
हवा में झूमते लहलहाते ब्रीक्ष यू जैसे तुम्हारी चंचलता की निशानी है   !!
यूँ नहीं की तुम बस एक कहानी हो !!

© आशुतोष त्रिपाठी

Friday, October 12, 2012

माँ

माँ आज फिर तुम्हारी याद आ रही है !!

चलो  आज फिर से घर की ओर चला जाये  !!

बेफ़िक्र होके सोया जाये माँ के आँचल  में !
दिल खोल के बात किया जाये माँ से ,बैठ  के उनकी गोद  में !
सारे  दुःख दर्द , जैसे  बाटाँ  करते थे बचपन में !
शिकायते  दोस्तों की, गिले  शिकवे माँ से ,फिर से आज बाटाँ  जाये !!

चलो  आज फिर से घर की ओर चला जाये  !!

© आशुतोष  त्रिपाठी 

Saturday, September 1, 2012

लो दिन बिता ,लो रात गई.....
सूरज ढलकर पश्चिम पंहुचा ...
डूबा , संध्या आई , छाई...
सौ संध्या सी वो संध्या थी...
क्यो उठते उठते सोचा था...
दिन में होगा कुछ बात नई |
लो दिन बिता .... लो रात गई...

© आशुतोष त्रिपाठी

शाम तेरे नाम !!


वो ्पुछते है हमसे, क़ि इतना ज़ामे-कश क्यो लगाते हो?
हमने कहा उनसे , यही वो वक्‍त है जब तुम याद नही आते हो !!
यू नही कि , हम तुम्हे याद नही करते!!
्लेकिन जब भी याद आते हो , बहुत आते हो !!
दिल के दरख्‍त से निकलते हँ जो आसू , उन्ही को इन पैमानो मे मिलने , हर शाम मैखाने चले आते है!!!

आज की शाम.... ज़ाम तेरे नाम..... ः)    

© आशुतोष त्रिपाठी

Sunday, September 12, 2010

सड़क पर चलते हुए....... !!!!!

आज फिर कूड़े के ढेर में खेलते हुए उन बच्चो को देखा है.......!!!
कूड़े के टुकडो में, उनके टूटते बिखरते सपनो को देखा है...!!!
हर बार ,इन्हें देख के लगता है कि, क्या बनेगा इनमे से कोई "कलाम" ??
या जीवन भर ,रहेंगे ये गुलाम ,भूख ,गरीबी और बेशहायी के....!!!
हर बार इन्हें देख के सोचता हूँ, कुछ मदद करू मैं इनकी...!!!
फिर भागती दुनिया के रफ़्तार से डर जाता हूँ मैं...!!!
डर जाता हूँ... पीछे छुटने से , और , सोचता हूँ....
आखिर मैं ही क्यों????
और शामिल हो जाता हूँ मैं भी इस बेदर्द दुनिया के रफ़्तार में ...!!!
और फिर कही किसी कूड़े के ढेर में रह जाता है एक "कलाम" हमेशा हमेशा के लिए.......
यु ही लाचार बेशहारा.......... यु ही लाचार बेशहारा !!!!

© आशुतोष त्रिपाठी

Saturday, November 22, 2008

विवशता....

किया समर्पण सबकुछ उस देवता को...
करू क्या अर्पण उसको अब???
करता धारण मृत्युशैया , अगर होता वश में...
हूँ मजबूर मगर , जिंदगी उसे देने का वादा है.....
© आशुतोष त्रिपाठी